Surdas in hindi. Surdas Ke Dohe With Meaning in Hindi 2019-01-07

Surdas in hindi Rating: 9,4/10 1328 reviews

सूरदास के पद अर्थ सहित

surdas in hindi

बाल भी हँसते हैं। तुम केवल मुझे हीं मारती होए दाऊ को कभी नहीं मारती हो। तुम शपथ पूर्वक बताओ कि मैं तेरा ही पुत्र हूँ। कृष्ण कि ये बातें सुनकर यशोदा मोहित हो जाती है। मुख दधि लेप किए सोभित कर नवनीत लिए। घुटुरुनि चलत रेनु तन मंडित मुख दधि लेप किए॥ चारु कपोल लोल लोचन गोरोचन तिलक दिए। लट लटकनि मनु मत्त मधुप गन मादक मधुहिं पिए॥ कठुला कंठ वज्र केहरि नख राजत रुचिर हिए। धन्य सूर एकौ पल इहिं सुख का सत कल्प जिए॥ अर्थ- भगवान श्रीकृष्ण अभी बहुत छोटे हैं और यशोदा के आंगन में घुटनों के बल चलते हैं। उनके छोटे से हाथ में ताजा मक्खन है और वे उस मक्खन को लेकर घुटनों के बल चल रहे हैं। उनके शरीर पर मिट्टी लगी हुई है। मुँह पर दही लिपटा हैए उनके गाल सुंदर हैं और आँखें चपल हैं। ललाट पर गोरोचन का तिलक लगा हुआ है। बालकृष्ण के बाल घुंघराले हैं। जब वे घुटनों के बल माखन लिए हुए चलते हैं तब घुंघराले बालों की लटें उनके कपोल पर झूमने लगती हैए जिससे ऐसा प्रतीत होता है मानो भौंरा मधुर रस पीकर मतवाले हो गए हैं। उनका सौंदर्य उनके गले में पड़े कंठहार और सिंह नख से और बढ़ जाती है। सूरदास जी कहते हैं कि श्रीकृष्ण के इस बालरूप का दर्शन यदि एक पल के लिए भी हो जाता तो जीवन सार्थक हो जाए। अन्यथा सौ कल्पों तक भी यदि जीवन हो तो निरर्थक ही है। बूझत स्याम कौन तू गोरी। कहां रहति काकी है बेटी देखी नहीं कहूं ब्रज खोरी॥ काहे को हम ब्रजतन आवतिं खेलति रहहिं आपनी पौरी। सुनत रहति स्त्रवननि नंद ढोटा करत फिरत माखन दधि चोरी॥ तुम्हरो कहा चोरि हम लैहैं खेलन चलौ संग मिलि जोरी। सूरदास प्रभु रसिक सिरोमनि बातनि भुरइ राधिका भोरी॥ अर्थ- श्रीकृष्ण जब पहली बार राधा से मिलेए तो उन्होंने राधा से पूछा कि हे गोरी! रोते नेत्र लाल हो गये भौंहें वक्र हो गई और बार बार जंभाई लेने लगे कभी वह घुटनों के बल चलते थे जिससे उनके पैरों में पड़ी पैंजनिया में से रुनझुन स्वर निकालते थे घुटनों के बल चलकर ही उन्होंने सारे शरीर को धुलदृधूसरित कर लिया कभी श्रीकृष्ण अपने ही बालों को खींचते और नैनों में आंसू भर लाते कभी तोतली बोली बोलते तो कभी तात ही बोलते सूरदास कहते हैं की श्रीकृष्ण की ऐसी शोभा को देखकर यशोदा उन्हें एक एक पाल भी छोड़ने को न हुई अर्थात् श्रीकृष्ण की इन छोटी छोटी लीलाओं में उन्हें अद्भुत रस आने लगा Surdas Ke Dohe दोहा : जसोदा हरि पालनै झुलावै हलरावै दुलरावै मल्हावै जोई सोई कछु गावै मेरे लाल को आउ निंदरिया काहें न आनि सुवावै तू काहै नहिं बेगहिं आवै तोकौं कान्ह बुलावै कबहुं पलक हरि मुंदी लेत हैं कबहुं अधर फरकावै सोवत जानि मौन ह्वै कै रहि करि करि सैन बतावै इहि अंतर अकुलाइ उठे हरी जसुमति मधुरै गावै जो सुख सुर अमर मुनि दुरलभ सो नंद भामिनी पावै अर्थ : मैया यशोदा श्रीकृष्ण को पालने में झुला रही हैं कभी तो वह पालने को हल्का सा हिला देती हैंए कभी कन्हैया को प्यार करने लगती हैं और कभी चूमने लगती हैं ऐसा करते हुए वह जो मन में आता हैं वही गुनगुनाने भी लगती हैं लेकिन कन्हैया को तब भी नींद नहीं आती हैं इसीलिए यशोदा नींद को उलाहना देती हैं की आरी निंदिया तू आकर मेरे लाल को सुलाती क्यों नहींघ् तू शीघ्रता से क्यों नहीं आतीघ् देखए तुझे कान्हा बुलाता हैं जब यशोदा निंदिया को उलाहना देती हैं तब श्रीकृष्ण कभी पलकें मूंद लेते हैं और कभी होठों को फडकाते हैं जब कन्हैया ने नयन मूंदे तब यशोदा ने समझा कि अब तो कान्हा सो ही गया हैं तभी कुछ गोपियां वहां आई गोपियों को देखकर यशोदा उन्हें संकेत से शांत रहने को कहती हैं इसी अंतराल में श्रीकृष्ण पुनरू कुनमुनाकर जाग गए तब उन्हें सुलाने के उद्देश से पुनरू मधुर मधर लोरियां गाने लगीं अंत में सूरदास नंद पत्नी यशोदा के भाग्य की सराहना करते हुए कहते है की सचमुच ही यशोदा बडभागिनी हैं क्योंकि ऐसा सुख तो देवताओं व ऋषि. Hii , मेरा नाम अजय शर्मा है और मै एक full time ब्लॉगर और YouTuber हूँ इसके अलावा मै Android एप्लीकेशन भी develope करता हूँ खुद को Motivate रखने तथा दुसरो को Motivate रखने के लिये मैंने इस ब्लॉग को बनाया है क्योंकि दुनिया जानती है कि अगर हमे किसी काम में सम्पूर्ण सफलता हाशिल करनी है तो सबसे पहले हमे अपने डर को हराना पड़ेगा क्योंकि ये डर ही होता है जो हमारे पांवो को बेड़ियों से बांध देता है और हमे आगे नही बढ़ने देता और इस डर को दूर भगाने का एक मात्र जरिया है खुद को मोटीवेट रखना जो आप महान लोगो के बारे में जानकर उनकी कहानिया पढकर उनके जीवन के बारे में जानकर कर सकते हैं कि कैसे उन्होंने अपने सपनों को साकार किया कैसे वे अपने डर से लड़े तो अगर आपको अपने सपनों को साकार करना है तो हमारे ब्लॉग से जुड़िए और अपने मानसिक स्तर को उस ऊचाई तक लेकर जाइए जहा नामुमकिन कुछ भी नहीं धन्यवाद! क्योंकि नंदबाबा तो गोरे हैं और मैया यशोदा भी गौरवर्णा हैं। लेकिन तू सांवले रंग का कैसे है? मुनियों को भी दुर्लभ है हरष आनंद बढ़ावत हरि अपनैं आंगन कछु गावत तनक तनक चरनन सों नाच मन हीं मनहिं रिझावत बांह उठाई कारी धौरी गैयनि टेरी बुलावत कबहुंक बाबा नंद पुकारत कबहुंक घर आवत माखन तनक आपनैं कर लै तनक बदन में नावत कबहुं चितै प्रतिबिंब खंभ मैं लोनी लिए खवावत दूरि देखति जसुमति यह लीला हरष आनंद बढ़ावत सुर स्याम के बाल चरित नित नितही देखत भावत अर्थ- श्रीकृष्ण अपने ही घर के आंगन में जो मन में आता है, वो गाते हैं वह छोटे. अभिगमन तिथि १० दिसम्बर २०१५. Prince Of Braj Awake, Krishna, awake the lotus-petals open the water-lilies droop the bumblebees have left the creepers cocks crow, and birds chirp on the trees. He describes 24 incarnations of the Lord interspersed with the legends of and.

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सूरदास

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मेरी आंखें नहीं मेरा जीवन तिमर अन्धेर में, बंदीखाना तिमर अन्धेरा तथा रक्षक भी तिमर अन्धेर! पिता कौन हैं। नन्द बाबा और मैया यशोदा दोनों गोरे हैंए तो तुम काले कैसे हो गए। ऐसा बोल. Sur's compositions are also found in the , the holy book of the. रोते नेत्र लाल हो गये भौंहें वक्र हो गई और बार बार जंभाई लेने लगे कभी वह घुटनों के बल चलते थे जिससे उनके पैरों में पड़ी पैंजनिया में से रुनझुन स्वर निकालते थे घुटनों के बल चलकर ही उन्होंने सारे शरीर को धुलदृधूसरित कर लिया कभी श्रीकृष्ण अपने ही बालों को खींचते और नैनों में आंसू भर लाते कभी तोतली बोली बोलते तो कभी तात ही बोलते सूरदास कहते हैं की श्रीकृष्ण की ऐसी शोभा को देखकर यशोदा उन्हें एक एक पाल भी छोड़ने को न हुई अर्थात् श्रीकृष्ण की इन छोटी छोटी लीलाओं में उन्हें अद्भुत रस आने लगा जसोदा हरि पालनै झुलावै हलरावै दुलरावै मल्हावै जोई सोई कछु गावै मेरे लाल को आउ निंदरिया काहें न आनि सुवावै तू काहै नहिं बेगहिं आवै तोकौं कान्ह बुलावै कबहुं पलक हरि मुंदी लेत हैं कबहुं अधर फरकावै सोवत जानि मौन ह्वै कै रहि करि करि सैन बतावै इहि अंतर अकुलाइ उठे हरी जसुमति मधुरै गावै जो सुख सुर अमर मुनि दुरलभ सो नंद भामिनी पावै अर्थ- मैया यशोदा श्रीकृष्ण को पालने में झुला रही हैं कभी तो वह पालने को हल्का सा हिला देती हैंए कभी कन्हैया को प्यार करने लगती हैं और कभी चूमने लगती हैं ऐसा करते हुए वह जो मन में आता हैं वही गुनगुनाने भी लगती हैं लेकिन कन्हैया को तब भी नींद नहीं आती हैं इसीलिए यशोदा नींद को उलाहना देती हैं की आरी निंदिया तू आकर मेरे लाल को सुलाती क्यों नहींघ् तू शीघ्रता से क्यों नहीं आतीघ् देखए तुझे कान्हा बुलाता हैं जब यशोदा निंदिया को उलाहना देती हैं तब श्रीकृष्ण कभी पलकें मूंद लेते हैं और कभी होठों को फडकाते हैं जब कन्हैया ने नयन मूंदे तब यशोदा ने समझा कि अब तो कान्हा सो ही गया हैं तभी कुछ गोपियां वहां आई गोपियों को देखकर यशोदा उन्हें संकेत से शांत रहने को कहती हैं इसी अंतराल में श्रीकृष्ण पुनरू कुनमुनाकर जाग गए तब उन्हें सुलाने के उद्देश से पुनरू मधुर मधर लोरियां गाने लगीं अंत में सूरदास नंद पत्नी यशोदा के भाग्य की सराहना करते हुए कहते है की सचमुच ही यशोदा बडभागिनी हैं क्योंकि ऐसा सुख तो देवताओं व ऋषि. तूने माखन खाया है क्याघ् तब बालकृष्ण ने अपना पक्ष किस तरह मैया के सामने प्रस्तुत करते हैंए यही इस दोहे की विशेषता हैं कन्हैया बोले३ मैया! आपके इस रूप के चरणों की मैं बलिहारी जाता हूँ। कबहुं बोलत तात खीझत जात माखन खात। अरुन लोचन भौंह टेढ़ी बार बार जंभात॥ कबहुं रुनझुन चलत घुटुरुनि धूरि धूसर गात। कबहुं झुकि कै अलक खैंच नैन जल भरि जात॥ कबहुं तोतर बोल बोलत कबहुं बोलत तात। सूर हरि की निरखि सोभा निमिष तजत न मात॥ अर्थ: यह पद राग रामकली में बद्ध है। एक बार श्रीकृष्ण माखन खाते-खाते रूठ गए और रूठे भी ऐसे कि रोते-रोते नेत्र लाल हो गए। भौंहें वक्र हो गई और बार-बार जंभाई लेने लगे। कभी वह घुटनों के बल चलते थे जिससे उनके पैरों में पड़ी पैंजनिया में से रुनझुन स्वर निकलते थे। घुटनों के बल चलकर ही उन्होंने सारे शरीर को धूल-धूसरित कर लिया। कभी श्रीकृष्ण अपने ही बालों को खींचते और नैनों में आंसू भर लाते। कभी तोतली बोली बोलते तो कभी तात ही बोलते। सूरदास कहते हैं कि श्रीकृष्ण की ऐसी शोभा को देखकर यशोदा उन्हें एक पल भी छोड़ने को न हुई अर्थात् श्रीकृष्ण की इन छोटी-छोटी लीलाओं में उन्हें अद्भुत रस आने लगा। चोरि माखन खात चली ब्रज घर घरनि यह बात। नंद सुत संग सखा लीन्हें चोरि माखन खात॥ कोउ कहति मेरे भवन भीतर अबहिं पैठे धाइ। कोउ कहति मोहिं देखि द्वारें उतहिं गए पराइ॥ कोउ कहति किहि भांति हरि कों देखौं अपने धाम। हेरि माखन देउं आछो खाइ जितनो स्याम॥ कोउ कहति मैं देखि पाऊं भरि धरौं अंकवारि। कोउ कहति मैं बांधि राखों को सकैं निरवारि॥ सूर प्रभु के मिलन कारन करति बुद्धि विचार। जोरि कर बिधि को मनावतिं पुरुष नंदकुमार॥ अर्थ: भगवान् श्रीकृष्ण की बाललीला से संबंधित सूरदास जी का यह पद राग कान्हड़ा पर आधारित है। ब्रज के घर-घर में इस बात की चर्चा हो गई कि नंदपुत्र श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ चोरी करके माखन खाते हैं। एक स्थान पर कुछ ग्वालिनें ऐसी ही चर्चा कर रही थीं। उनमें से कोई ग्वालिन बोली कि अभी कुछ देर पूर्व तो वह मेरे ही घर में आए थे। कोई बोली कि मुझे दरवाजे पर खड़ी देखकर वह भाग गए। एक ग्वालिन बोली कि किस प्रकार कन्हैया को अपने घर में देखूं। मैं तो उन्हें इतना अधिक और उत्तम माखन दूं जितना वह खा सकें। लेकिन किसी भांति वह मेरे घर तो आएं। तभी दूसरी ग्वालिन बोली कि यदि कन्हैया मुझे दिखाई पड़ जाएं तो मैं गोद में भर लूं। एक अन्य ग्वालिन बोली कि यदि मुझे वह मिल जाएं तो मैं उन्हें ऐसा बांधकर रखूं कि कोई छुड़ा ही न सके। सूरदास कहते हैं कि इस प्रकार ग्वालिनें प्रभु मिलन की जुगत बिठा रही थीं। कुछ ग्वालिनें यह भी विचार कर रही थीं कि यदि नंदपुत्र उन्हें मिल जाएं तो वह हाथ जोड़कर उन्हें मना लें और पतिरूप में स्वीकार कर लें। गाइ चरावन जैहौं आजु मैं गाइ चरावन जैहौं। बृन्दावन के भांति भांति फल अपने कर मैं खेहौं॥ ऐसी बात कहौ जनि बारे देखौ अपनी भांति। तनक तनक पग चलिहौ कैसें आवत ह्वै है राति॥ प्रात जात गैया लै चारन घर आवत हैं सांझ। तुम्हारे कमल बदन कुम्हिलैहे रेंगत घामहि मांझ॥ तेरी सौं मोहि घाम न लागत भूख नहीं कछु नेक। सूरदास प्रभु कह्यो न मानत पर्यो अपनी टेक॥ अर्थ: यह पद राग रामकली में बद्ध है। एक बार बालकृष्ण ने हठ पकड़ लिया कि मैया आज तो मैं गौएं चराने जाऊंगा। साथ ही वृन्दावन के वन में उगने वाले नाना भांति के फलों को भी अपने हाथों से खाऊंगा। इस पर यशोदा ने कृष्ण को समझाया कि अभी तो तू बहुत छोटा है। इन छोटे-छोटे पैरों से तू कैसे चल पाएगा. तो उसने कहा -'तिमर ' यह सुन कर सूरदास बहुत हैरान हुआ कवि था, ख्यालों की उड़ान में सोचा, 'तिमर. सूर ने वात्सल्य, श्रृंगार और शांत रसों को मुख्य रूप से अपनाया है। सूर ने अपनी कल्पना और प्रतिभा के सहारे कृष्ण के बाल्य-रूप का अति सुंदर, सरस, सजीव और मनोवैज्ञानिक वर्णन किया है। बालकों की चपलता, स्पर्धा, अभिलाषा, आकांक्षा का वर्णन करने में विश्व व्यापी बाल-स्वरूप का चित्रण किया है। बाल-कृष्ण की एक-एक चेष्टा के चित्रण में कवि ने कमाल की होशियारी एवं सूक्ष्म निरीक्षण का परिचय दिया है़- मैया कबहिं बढैगी चौटी? बाल भी हँसते हैं। तुम केवल मुझे हीं मारती होए दाऊ को कभी नहीं मारती हो। तुम शपथ पूर्वक बताओ कि मैं तेरा ही पुत्र हूँ। कृष्ण कि ये बातें सुनकर यशोदा मोहित हो जाती है Surdas Ke Dohe दोहा : कबहुं बोलत तात खीझत जात माखन खात अरुन लोचन भौंह टेढ़ी बार बार जंभात कबहुं रुनझुन चलत घुटुरुनि धुरि धूसर गात कबहुं झुकि कै अलक खैंच नैन जल भरि जात कबहुं तोतर बोल बोलत कबहुं बोलत तात सुर हरी की निरखि सोभा निमिष तजत न मात अर्थ : एक बार कृष्ण माखन खाते खाते रूठ गए और रूठे भी ऐसे की रोते.

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Surdas Ke Pad Class 10 ( सूरदास के पद )

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आपके इस रूप के चरणों की मैं बलिहारी जाता हूँ मैं नहीं माखन खायो मैया मैं नहीं माखन खायो ख्याल परै ये सखा सबै मिली मेरै मुख लपटायो देखि तुही छींके पर भजन ऊँचे धरी लटकायो हौं जु कहत नान्हें कर अपने मैं कैसे करि पायो मुख दधि पोंछी बुध्दि एक किन्हीं दोना पीठी दुरायो डारी सांटी मुसुकाइ जशोदा स्यामहिं कंठ लगायो बाल बिनोद मोद मन मोह्यो भक्ति प्राप दिखायो सूरदास जसुमति को यह सुख सिव बिरंचि नहिं पायो अर्थ- श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं में माखन चोरी की लीला सुप्रसिद्ध वैसे तो कान्हा ग्वालिनों के घरो में जाकर माखन चुराकर खाया करते थे लेकिन आज उन्होंने अपने ही घर में माखन चोरी की और यशोदा मैया ने उन्हें देख लिया सूरदासजी ने श्रीकृष्ण के वाक्चातुर्य का जिस प्रकार वर्णन किया है वैसा अन्यत्र नहीं मिलता यशोदा मैया ने देखा कि कान्हा ने माखन खाया हैं तो उन्होंने कान्हा से पूछा की क्योरे कान्हा! लीलाओं को देखकर नित्य हर्षाती हैं Surdas Ke Dohe दोहा : जो तुम सुनहु जसोदा गोरी नंदनंदन मेरे मंदीर में आजू करन गए चोरी हों भइ जाइ अचानक ठाढ़ी कह्यो भवन में कोरी रहे छपाइ सकुचि रंचक ह्वै भई सहज मति भोरी मोहि भयो माखन पछितावो रीती देखि कमोरी जब गहि बांह कुलाहल किनी तब गहि चरन निहोरी लागे लें नैन जल भरि भरि तब मैं कानि न तोरी सूरदास प्रभु देत दिनहिं दिन ऐसियै लरिक सलोरी अर्थ : इस पद में भगवान् की बाल लीला का रोचक वर्णन हैं एक ग्वालिन यशोदा के पास कन्हैया की शिकायत लेकर आयी वो बोली की हे नंदभामिनी यशोदा! The greatest blessing of Surdas's life came when Sri Vallabhacharya, the celebrated exponent of the Shuddhadvaita. तुम कौन होघ् कहाँ रहती होघ् किसकी पुत्री होघ् मैंने तुम्हें पहले कभी ब्रज की गलियों में नहीं देखा है। तुम हमारे इस ब्रज में क्यों चली आईघ् अपने ही घर के आंगन में खेलती रहती। इतना सुनकर राधा बोलीए मैं सुना करती थी कि नंदजी का लड़का माखन चोरी करता फिरता है। तब कृष्ण बात बदलते हुए बोलेए लेकिन तुम्हारा हम क्या चुरा लेंगे। अच्छा चलोए हम दोनों मिलजुलकर खेलते हैं। सूरदास कहते हैं कि इस प्रकार कृष्ण ने बातों ही बातों में भोली. इस blog post को अधिक से अधिक share कीजिये और यदि आप ऐसे ही और रोमांचिक articles, tutorials, guides, quotes, thoughts, slogans, stories इत्यादि कुछ भी हिन्दी में पढना चाहते हैं तो हमें subscribe ज़रूर कीजिये. Follow us on Facebook facebook. The Sur Sagar in its present form focuses on descriptions of Krishna as a lovable child, written from the ' perspective. . तुम कौन होघ् कहाँ रहती होघ् किसकी पुत्री होघ् मैंने तुम्हें पहले कभी ब्रज की गलियों में नहीं देखा है। तुम हमारे इस ब्रज में क्यों चली आईघ् अपने ही घर के आंगन में खेलती रहती। इतना सुनकर राधा बोलीए मैं सुना करती थी कि नंदजी का लड़का माखन चोरी करता फिरता है। तब कृष्ण बात बदलते हुए बोलेए लेकिन तुम्हारा हम क्या चुरा लेंगे। अच्छा चलोए हम दोनों मिलजुलकर खेलते हैं। सूरदास कहते हैं कि इस प्रकार कृष्ण ने बातों ही बातों में भोली.

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Surdas Ke Dohe With Meaning in Hindi

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यदि आपको इसमें कोई भी खामी लगे या आप अपना कोई सुझाव देना चाहें तो आप नीचे comment ज़रूर कीजिये. It is analogical to the festival of , where the Lord is the Great Player, who, in his playful mood, creates the universe and the Primerial man out of himself, who is blessed with the three , namely , and. The Sursagar's modern reputation focuses on descriptions of Krishna as a lovable child, usually drawn from the perspective of one of the cowherding gopis of Braj. सुनो तोए नंदनंदन कन्हैया आज मेरे घर में चोरी करने गएद पीछे से मैं भी अपने भवन के निकट ही छुपकर खड़ी हो गई मैंने अपने शरीर को सिकोड़ लिया और भोलेपन से उन्हें देखती रही जब मैंने देखा की माखन भरी वह मटकी बिल्कुल ही खाली हो गई हैं तो मुझे बहुत पछतावा हुआ जब मैंने आगे बढ़कर कन्हैया की बांह पकड़ ली और शोर मचाने लगी, तब कन्हैया मेरे चरणों को पकड़कर मेरी मनुहार करने लगे इतना ही नहीं उनके नयनोँ में अश्रु भी भर आए ऐसे में मुझे दया आ गई और मैंने उन्हें छोड़ दिया सूरदास कहते हैं की इस प्रकार रोज ही विभिन्न लीलाएं कर कन्हैया ने ग्वालिनों को सुख पहुँचाया Surdas Ke Dohe दोहा : अरु हलधर सों भैया कहन लागे मोहन मैया मैया नंद महर सों बाबा अरु हलधर सों भैया ऊंचा चढी चढी कहती जशोदा लै लै नाम कन्हैया दुरी खेलन जनि जाहू लाला रे! भाली राधा को भरमा दिया Surdas Ke Dohe दोहा : अब कै माधव मोहिं उधारि। मगन हौं भाव अम्बुनिधि में कृपासिन्धु मुरारि॥ नीर अति गंभीर माया लोभ लहरि तरंग। लियें जात अगाध जल में गहे ग्राह अनंग॥ मीन इन्द्रिय अतिहि काटति मोट अघ सिर भार। पग न इत उत धरन पावत उरझि मोह सिबार॥ काम क्रोध समेत तृष्ना पवन अति झकझोर। नाहिं चितवत देत तियसुत नाम. बोल कर वे नाचते हैंए और उनके साथ सभी ग्वाल. छुपकर देखती हैं और मन ही मन में प्रसन्न होती हैं सूरदासजी कहते हैं की इस प्रकार यशोदा श्रीकृष्ण की बाल. In contempary writings, it is said to contain one lakh verses, out of which many were lost due to obscurity and uncertainty of the times.

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Biography of Poet Surdas in Hindi महाकवि संत सूरदास की जीवनी

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It states that he met and became his disciple while going on a pilgrimage to. His compositions are in Braj Bhasha a dialect of Hindi that was considered crude at the time. अभिगमन तिथि १० दिसम्बर २०१५. We hope it will help you to understand this Poem. However, the authenticity of this legend is disputed due to the absence of Vallabha Acharya from early poems of Sur and the awkward logic of the story. तूने माखन खाया है क्या? Surdas' works are some of those credited with raising this dialect to a literary status. मैंने माखन नहीं खाया हैं मुझे तो ऐसा लगता हैं की ग्वालदृबालों ने ही जबरदस्ती मेरे मुख पर माखन लगा दिया है फिर बोले की मैया तू ही सोचए तूने यह छींका किना ऊंचा लटका रखा हैं मेरे हाथ भी नहीं पहुँच सकते हैं कन्हैया ने मुख से लिपटा माखन पोंछा और एक कटोरा जिसमें माखन बचा था उसे छिपा लिया कन्हैया की इस चतुराई को देखकर यशोदा मन ही मन में मुस्कुराने लगी और कन्हैया को गले से लगा लिया सूरदासजी कहते हैं यशोदा मैया को जिस सुख की प्राप्ति हुई वह सुख शिव व ब्रम्हा को भी दुर्लभ हैं भगवान श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं के माध्यम से यह सिद्ध किया हैं कि भक्ति का प्रभाव कितना महत्वपूर्ण हैं.

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Biography of Poet Surdas in Hindi महाकवि संत सूरदास की जीवनी

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मदन मोहन एक बहुत ही सुन्दर और तेज बुद्धि के नवयुवक थे वह हर दिन नदी के किनारे जा कर बैठ जाता और गीत लिखता । एक दिन एक ऐसा वाक्य हुआ जिसने उसके मन को मोह लिया । हुआ ये की एक सुन्दर नवयुवती नदी किनारे कपडे धो रही थी मदन मोहन का ध्यान उसकी तरफ चला गया । उस युवती ने मदन मोहन को ऐसा आकर्षित किया की वह कविता लिखने से रुक गया । तथा पुरे ध्यान से उस युवती को देखने लगा । उनको ऐसा लगा मानो यमुना किनारे राधिका स्नान कर के बैठी हो । उस नवयुवती ने भी मदन मोहन की तरफ देखा और उनके पास आकर बोली आप मदन मोहन जी हो ना? तो वह बोले हां मैं मदन मोहन हूँ। कविताये लिखता हूँ तथा गाता हूँ आपको देखा तो रुक गया । नवयुवती ने पूछा क्यों? Most of the poems in the composition, although attributed to him, seem to be composed by later poets in his name. पिता कौन हैं। नन्द बाबा और मैया यशोदा दोनों गोरे हैंए तो तुम काले कैसे हो गए। ऐसा बोल. छोटे पैरो से थिरकते हैं तथा मन ही मन स्वयं को रिझाते भी हैं कभी वह भुजाओं को उठाकर कली श्वेत गायों को बुलाते हैए तो कभी नंद बाबा को पुकारते हैं और घर में आ जाते हैं अपने हाथों में थोडा सा माखन लेकर कभी अपने ही शरीर पर लगाने लगते हैंए तो कभी खंभे में अपना प्रतिबिंब देखकर उसे माखन खिलाने लगते हैं श्रीकृष्ण की इन सभी लीलाओं को माता यशोदा छुप. मारैगी काहू की गैया गोपी ग्वाल करत कौतुहल घर घर बजति बधैया सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस कों चरननि की बलि जैया अर्थ- सूरदास कहते हैं की अब श्रीकृष्ण मुख से यशोदा को मैयादृमैया, नंदबाबा को बाबादृबाबा व बलराम को भैया कहकर पुकारने लगे हैं इतना ही नहीं अब वह नटखट भी हो गए हैंए तभी तो यशोदा ऊंची होकर अर्थात कन्हैया जब दूर चले जाते हैं तब उचकदृउचककर कन्हैया को नाम लेकर पुकारती हैं और कहती हैं की लल्ला गाय तुझे मारेंगी सूरदास कहते हैं की गोपियों व ग्वालों को श्रीकृष्ण की लीलाएं देखकर अचरज होता हैं श्रीकृष्ण अभी छोटे ही हैं और लीलाएं भी अनोखी हैं इन लीलाओं को देखकर ही सब लोग बधाइयाँ दे रहे हैं सूरदासजी कहते हैं की हे प्रभु! छुपकर देखती हैं और मन ही मन में प्रसन्न होती हैं सूरदासजी कहते हैं की इस प्रकार यशोदा श्रीकृष्ण की बाल. क्रोध आदि की वायु झकझोर रही है। तब एक हरि नाम की नाव हीं पार लगा सकती है। स्त्री और बेटों का माया.

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They are usually written in , one of the two literary dialects of. प्यार है कि एक बच्चे के रूप में किया गया था उसे इनकार कर दिया, प्यार है कि बाला गोपाला पर ब्रज में Yashoda, Nandagopa, gopis और Gopas बौछार अपने गीतों के माध्यम से बहती है. इसी कारण मैं खेलने भी नहीं जाता। वह मुझसे बार-बार कहता है कि तेरी माता कौन है और तेरे पिता कौन हैं? The same is the case with the year of his death; it is considered to be between 1561 and 1584. और फिर लौटते समय रात्रि भी हो जाती है। तुझसे अधिक आयु के लोग गायों को चराने के लिए प्रात: घर से निकलते हैं और संध्या होने पर लौटते हैं। सारे दिन धूप में वन-वन भटकना पड़ता है। फिर तेरा वदन पुष्प के समान कोमल है, यह धूप को कैसे सहन कर पाएगा। यशोदा के समझाने का कृष्ण पर कोई प्रभाव नहीं हुआ, बल्कि उलटकर बोले, मैया! नौका ओर॥ थक्यौ बीच बेहाल बिह्वल सुनहु करुनामूल। स्याम भुज गहि काढ़ि डारहु सूर ब्रज के कूल॥ अर्थ : संसार रूपी सागर में माया रूपी जल भरा हुआ हैए लालच की लहरें हैंए काम वासना रूपी मगरमच्छ हैए इन्द्रियाँ मछलियाँ हैं और इस जीवन के सिर पर पापों की गठरी रखी हुई है। इस समुद्र में मोह सवार है। काम. This movement represented spiritual empowerment of the masses. मारैगी काहू की गैया॥ गोपी ग्वाल करत कौतूहल घर घर बजति बधैया। सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस कों चरननि की बलि जैया॥ अर्थ: सूरदास जी का यह पद राग देव गंधार में आबद्ध है। भगवान् बालकृष्ण मैया, बाबा और भैया कहने लगे हैं। सूरदास कहते हैं कि अब श्रीकृष्ण मुख से यशोदा को मैया-मैया नंदबाबा को बाबा-बाबा व बलराम को भैया कहकर पुकारने लगे हैं। इना ही नहीं अब वह नटखट भी हो गए हैं, तभी तो यशोदा ऊंची होकर अर्थात् कन्हैया जब दूर चले जाते हैं तब उचक-उचककर कन्हैया को नाम लेकर पुकारती हैं और कहती हैं कि लल्ला गाय तुझे मारेगी। सूरदास कहते हैं कि गोपियों व ग्वालों को श्रीकृष्ण की लीलाएं देखकर अचरज होता है। श्रीकृष्ण अभी छोटे ही हैं और लीलाएं भी उनकी अनोखी हैं। इन लीलाओं को देखकर ही सब लोग बधाइयां दे रहे हैं। सूरदास कहते हैं कि हे प्रभु! छोटे पैरो से थिरकते हैं तथा मन ही मन स्वयं को रिझाते भी हैं कभी वह भुजाओं को उठाकर कली श्वेत गायों को बुलाते हैए तो कभी नंद बाबा को पुकारते हैं और घर में आ जाते हैं अपने हाथों में थोडा सा माखन लेकर कभी अपने ही शरीर पर लगाने लगते हैंए तो कभी खंभे में अपना प्रतिबिंब देखकर उसे माखन खिलाने लगते हैं श्रीकृष्ण की इन सभी लीलाओं को माता यशोदा छुप.

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Surdas Ke Dohe With Meaning in Hindi

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Surdas is usually regarded as having taken his inspiration from the teachings of , whom he is supposed to have met in 1510. भाली राधा को भरमा दिया। मुखहिं बजावत बेनु धनि यह बृंदावन की रेनु। नंदकिसोर चरावत गैयां मुखहिं बजावत बेनु॥ मनमोहन को ध्यान धरै जिय अति सुख पावत चैन। चलत कहां मन बस पुरातन जहां कछु लेन न देनु॥ इहां रहहु जहं जूठन पावहु ब्रज बासिनि के ऐनु। सूरदास ह्यां की सरवरि नहिं कल्पबृच्छ सुरधेनु॥ अर्थ- यह ब्रज की मिट्टी धन्य है जहाँ श्रीकृष्ण गायों को चराते हैं तथा अधरों पर रखकर बांसुरी बजाते हैं। उस भूमि पर कृष्ण का ध्यान करने से मन को बहुत शांति मिलती है। सूरदास मन को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि अरे मन! तू शीघ्रता से क्यों नहीं आती? मैं नहिं माखन खायो। ख्याल परै ये सखा सबै मिलि मेरैं मुख लपटायो॥ देखि तुही छींके पर भाजन ऊंचे धरि लटकायो। हौं जु कहत नान्हें कर अपने मैं कैसें करि पायो॥ मुख दधि पोंछि बुद्धि इक कीन्हीं दोना पीठि दुरायो। डारि सांटि मुसुकाइ जशोदा स्यामहिं कंठ लगायो॥ बाल बिनोद मोद मन मोह्यो भक्ति प्राप दिखायो। सूरदास जसुमति को यह सुख सिव बिरंचि नहिं पायो॥ अर्थ: राग रामकली में बद्ध यह सूरदास का अत्यंत प्रचलित पद है। श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं में माखन चोरी की लीला सुप्रसिद्ध है। वैसे तो कन्हैया ग्वालिनों के घरों में जा-जाकर माखन चुराकर खाया करते थे। लेकिन आज उन्होंने अपने ही घर में माखन चोरी की और यशोदा ने उन्हें देख भी लिया। इस पद में सूरदास ने श्रीकृष्ण के वाक्चातुर्य का जिस प्रकार वर्णन किया है वैसा अन्यत्र नहीं मिलता। जब यशोदा ने देख लिया कि कान्हा ने माखन खाया है तो पूछ ही लिया कि क्यों रे कान्हा! तब श्रीकृष्ण अपना पक्ष किस तरह मैया के समक्ष प्रस्तुत करते हैं, यही इस पद की विशिष्टता है। कन्हैया बोले. उधर देखने हीं नहीं देता। भगवान हीं हाथ पकड़कर हमारा बेड़ा पार कर सकते हैं। Surdas Ke Dohe दोहा : मुखहिं बजावत बेनु धनि यह बृंदावन की रेनु। नंदकिसोर चरावत गैयां मुखहिं बजावत बेनु॥ मनमोहन को ध्यान धरै जिय अति सुख पावत चैन। चलत कहां मन बस पुरातन जहां कछु लेन न देनु॥ इहां रहहु जहं जूठन पावहु ब्रज बासिनि के ऐनु। सूरदास ह्यां की सरवरि नहिं कल्पबृच्छ सुरधेनु॥ अर्थ : यह ब्रज की मिट्टी धन्य है जहाँ श्रीकृष्ण गायों को चराते हैं तथा अधरों पर रखकर बांसुरी बजाते हैं। उस भूमि पर कृष्ण का ध्यान करने से मन को बहुत शांति मिलती है। सूरदास मन को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि अरे मन! However, the absence of Vallabha Acharya from early poems of Surdas and the awkward story of their meeting suggests that Surdas was an independent poet. बार मुझसे पूछते हैं कि तुम्हारे माता. . He left home at the tender age of 6.

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कृष्णभक्त सूरदास का जीवन परिचय, Surdas Story in hindi

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Sur is considered to be the foremost among them, however, his association with the Vallabhite community may well have been invented by Vallabhites. इसके इलावा आप अपना कोई भी विचार हमसे comment के ज़रिये साँझा करना मत भूलिए. कवि सूरदास का जीवन परिचय Surdas Biography in Hindi Surdas Jivani in Hindi subscribe our channel - सूरदास का जीवन परिचय : Surdas Biography in Hindi Bhakt surdas story भक्त सूरदास - Hindi कवि सूरदास का जीवन परिचय, Surdas Biography in Hindi सूरदास का जीवन परिचय Surdas Biography, Essay in Hindi सूरदास जी का जीवन परिचय, सूरदास जी की रचनाएं, ग्रन्थ biography of surdas in hindi, surdas, biography of surdas in hindi, biography of surdas in hindi, biography of surdas in hindi language, biography of surdas in hindi translate, सूरदास का जीवन परिचय, सूरदास जी का जीवन परिचय, सूरदास जी की जीवनी, सूरदास का जीवन, सूरदास हिन्दी के कवि, हिन्दी कवि सरदास, संत सूरदास का जीवन परिचय, surdas essay in hindi, surdas biography in hindi, सूरदास की रचनाएँ,surdas jivni hindi, surdas jivni, surdas jivani, surdas ki jivni in hindi pdf, surdas jivani in hindi, surdas jivan prichay, surdas jeevan parichay in hindi, surdas jeevan parichay, surdas jivani in hindi, surdas jivani, surdas jivani hindi,surdas ji ka jeevan parichay, surdas ji ka jeevan parichay in hindi, surdas ji ka jeevan parichay hindi main, surdas ji ka jeevan parichay short me, surdas ji ka jeevan parichay, tulsidas ji ka jeevan parichay, surdas ji ka jeevan parichay in hindi, surdas ji ka jeevan parichay in english, surdas ji ka jeevan parichay hindi me, surdas ji ka jivan parichay in hindi, सूरदास जी का जीवन परिचय, सूरदास जी की जीवनी, सूरदास का जीवन, सूरदास हिन्दी के कवि, हिन्दी कवि सरदास, संत सूरदास का जीवन परिचय, surdas, surdas ki jeevni,surdas ka jeevan parichay, tulsidas ka jeevan parichay, surdas, surdas jeevan parichay, surdas biography in hindi, surdas ki bhakti marg kya hai, class 10 hindi kavi parichay expart salah, surdas ka jeevan parichay wikipedia, surdas ki rachnaye, surdas kis sasankal, surdas life story in hindi, surdas ji ka jeevan parichay, bhakti kal ke kavi in hindi, sabhi lekhak ka jeevan parichay, surdas ka janm aur mrityu, tulsidas ke jivan parichay in hindi, surdas ka parichay in hindi, kavi senapati ka jeevan parichay, surdas ka sahityik parichay, kvi surdaas ke ma baap ke name, surdas ka bara ma,. मुनियों को भी दुर्लभ है Surdas Ke Dohe दोहा : हरष आनंद बढ़ावत हरि अपनैं आंगन कछु गावत तनक तनक चरनन सों नाच मन हीं मनहिं रिझावत बांह उठाई कारी धौरी गैयनि टेरी बुलावत कबहुंक बाबा नंद पुकारत कबहुंक घर आवत माखन तनक आपनैं कर लै तनक बदन में नावत कबहुं चितै प्रतिबिंब खंभ मैं लोनी लिए खवावत दूरि देखति जसुमति यह लीला हरष आनंद बढ़ावत सुर स्याम के बाल चरित नित नितही देखत भावत अर्थ : श्रीकृष्ण अपने ही घर के आंगन में जो मन में आता है, वो गाते हैं वह छोटे. He then narrates the story of the incarnation of Krishna. It is likely that Sur was an independent poet, suggested by his acceptance to all communities.

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